आधुनिक हिंदी साहित्य के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र

हिंदी साहित्य के आधुनिक कालीन अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र बहुमुखी प्रतिभा के प्रतिभाशाली व्यक्तित्व है। इसी प्रतिभा के कारण कवि हरिश्चंद्र जी को 1880 में हिंदी साहित्य की श्री वृद्धि हेतु” भारतेंदु” नाम से सम्मानित किया गया । इनकी कलम जितनी तेजी से साहित्य लिखने के लिए चलती थी उतनी ही तेजी से समाचार पत्रों के संपादन के लिए भी चलती थी ।
कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका,हरिश्चंद्र मैग्जीन उनके संपादन में प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध पत्र थे।आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है
” हिंदी गद्य का ठीक परिष्कृत रूप पहले पहल हरिश्चंद्र चंद्रिका में ही प्रकट हुआ।”
जिनमें इनके ओजस्वी सोच का स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है ।भारतेंदु सच्चे देशभक्त थे,तत्कालीन अंगेजी सरकार की नीति , शोषण नीति से बहुत क्षुब्ध और दुखी रहते थे “भीतर भीतर सब रस चुसै,हंसी हंसी के तन मन धन मुसै।जाहिर बातन अति तेज ,क्यों सखि साजन नही अग्रेज”
“रोवहु सब मिलि आबहु भारत भाई।हा हा भारत दुर्दशा देखी ना जाई”भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का भाषा पर पकड़ बहुत मजबूत था। वे कई भाषाओ के ज्ञाता थे। जितनी आसानी से खड़ी बोली में कविता लिखते थे ,उतनी ही आसानी से ब्रजभाषा में भी लिखते थे ,उर्दू शैली में भी इनकी जबरदस्त पकड़ थी। प्राचीन वर्तमान एवं नवीन तीनो का संगम इनकी रचनाओ में देखा जा सकता है। भक्ति, शृंगारिकता, देश प्रेम ,सामाजिक परिवेश, और प्रकृति की विभिन्न संदर्भों को लेकर उन्होंने रचनाएं की, जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है ।इनका जीवन काल मात्र 35 वर्ष का रहा परंतु इन्होंने अपने आप को साहित्य लेखन के द्वारा अमर कर लिया। साहित्य की हर विधा को उन्होंने समृद्ध किया कविता नाटक उपन्यास इन्होंने साहित्य की हर विधा की रचना की ।कवि हरिश्चंद्र के मार्गदर्शन में हिंदी साहित्य के बहुत सारे कवि सामने आए हिन्दी साहित्य का सृजन किया।
कविवर भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितम्बर 1850 एवं निधन 1885 में हुआ था इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीरचंद के वंश में इनका जन्म हुआ था ।भारतेंदु जी के पिता भी प्रसिद्ध कवि बाबू गोपाल चंद्र गिरिधरदास थे। बाल्यकाल से हरिश्चंद्र रचनाएं करते थे ,और जानते थे कि भारत की भाषा” हिंदी” भारत की पहचान है। यही भारत को आजादी दिलाने में मदद करेगी । कवि हरिश्चंद्र का कहना था कि ,शिक्षा चाहे ,जिस भी भाषा में हासिल करें ,चाहे जिस भी देश में जाकर अध्ययन करें, किंतु अपनी मातृभाषा से ही हमारी उन्नति हो सकती है। जो शिक्षा हम अन्य जगह से या अन्य भाषा में ग्रहण करते हैं उससे सीख ले कर हम अपने देश का अपने मातृभाषाओं भाषाओ का विकास करें ,इसलिए उन्होंने कहा है
“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।इनकी रचनाओं में प्रेम सरोवर गीत गोविंद नंद गोविंद आनंद वर्षा विनोद विनय प्रेम पचासा प्रेम पचासा प्रेम फुलवारीकविता आदि उल्लेखनीय हैं नाटक में वैदिकी हिंसा ना भवति चंद्रावली विषस्य विषमौषधम् भारत दुर्दशा नील देवी प्रेम जोगनी सती प्रताप अंधेर नगरी आदि उल्लेखनीय हैं कहानियों में एक कहानी कुछ आप बीती कुछ जग बीती उपन्यास पूर्ण प्रकाश चंद्र प्रभा हिंदी साहित्य के इस अद्वितीय कवि लेखक को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन।
सुनीता कुमारी
पूर्णियाँ ,बिहार।



