साहित्य

साहित्य वह है जो मनुष्य के आचरण, सभ्यता और संस्कृति को सुयोग्य तथा गुणों से परिपूर्ण करता है। साहित्य ही हमें समाज में सामाजिक बनाता है। वैसे तो देखा जाए तो व्यक्तियों के समूह को ही समाज कहते हैं ,किंतु अगर उस समूह में बोलने की सभ्यता ,संस्कृति और रहन-सहन सही नहीं है तो यह मनुष्यों का समूह पशुओं के उसी झुण्ड के समान है जो पृथ्वी का भार बनकर इस मृत्युलोक में केवल अपना पेट भरने के लिए विचरण करते हैं।
यथा ;
येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ (चाणक्य नीति)
कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो साहित्य पढ़कर भी साहित्य के भाव को समझने की कोशिश नहीं करते ।ऐसे मनुष्यों के कारण ही आज वर्तमान समय में एक साहित्यिक कवि और हमारी मातृभाषा हिंदी को हीनता की दृष्टि से देखा जाता है ।
हमारा यही समाज और हमारे ही समाज के लोग दुनिया के दिखावे के लिए साहित्य की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, और यही लोग अकेले में अथवा परोक्ष में उसी साहित्य की निंदा करते हैं। ऐसे साहित्यिक विद्वान उसी मित्र के समान हैं जिनके हृदय में विष भरा होता है किंतु सामने से प्रियवादी होते हैं।
यथा; परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥
मैंने अपने जीवन काल में भले ही कुछ ना सीखा हो किंतु साहित्य और मेरी मातृभाषा हिंदी का मेरे हृदय में वही स्थान है जो स्थान एक असहाय बालक के जीवन में उसके माता पिता का होता है जिस प्रकार माता-पिता अपने बालक को हाथ पकड़कर चलना सिखाते हैं ,उसी प्रकार साहित्य ने मुझे सही मार्ग का चयन करना सिखाया है और मैं अपने साहित्य की गोद में हमेशा, जीवन पर्यंत रहना चाहूंगी।
मेरी पहचान है साहित्य,
मेरा अभिमान है साहित्य।
हृदय के भाव लिए मेरी,
उंगलियों में लिपटा है जो
वह है साहित्य।



