जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

प्रथम भारतीय महिला शिक्षक सावित्री फुले जी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि

जबलपुर दर्पण। देश की पहली महिला शिक्षिका एवं नारी मुक्ति आंदोलन की प्रणेता,महान समाज सुधारक सावित्री बाई फुले जी की 192वी जयंती के अवसर पर शांतम प्रज्ञा आश्रम नशा मुक्ति,मनोआरोग्य, दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में श्रृद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी पिछड़ा वर्ग मोर्चा के नगर उपाध्यक्ष रूपेश पिंटू पटेल एवं सुनील पटेल महामंत्री भाजपा के मुख्य आतिथ्य में सावित्री बाई फुले जी के तेलचित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर श्रृद्धांजलि अर्पित की।
अतिथि रूपेश पिंटू पटेल जी ने सावित्री बाई फुले जी के जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि भारत की पहली सामाजिक कार्यकर्ता एवं महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले जी का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा स्थित नायगांव में एक दलित परिवार में हुआ था। वह मां लक्ष्मी और पिता खंडोजी नेवसे पाटिल की सबसे बड़ी बेटी थीं। उन दिनों दलित महिलाओं को सीमित दायरे में रखा जाता था। शिक्षा के प्रति रुझान होते हुए भी वे पढ़-लिख नहीं सकीं थीं, लेकिन शादी के बाद पति ज्योतिराव फुले के सहयोग से उन्होंने शिक्षा हासिल करने के साथ-साथ गांव की महिलाओं को भी शिक्षा के लिए प्रेरित किया।
सावित्रीबाई पढ़ना-लिखना चाहती थीं, लेकिन उस समय महिलाओं के लिए पढ़ना-लिखना उचित नहीं माना जाता था। यहां तक कि उनकी पढ़ाई लिखाई का विरोध उनके पिता ने भी किया। उनके पिता ने कहा था कि शिक्षा सिर्फ उच्च जाति के लोग ही ग्रहण कर सकते हैं, दलित, पिछड़े और महिलाओं को शिक्षा लेने का अधिकार नहीं है, क्योंकि उनका पढ़ना पाप है। इस तरह समाज में रूढ़ीवादी सोच चारों ओर व्याप्त थी। अतिथि सुनील पटेल ने बताया कि सावित्रीबाई फुले जी ने प्रण लिया था कि वह शिक्षा ग्रहण करके रहेंगी। अपने पति ज्योतिबा फुले की मदद से सावित्रीबाई पढ़ाई करने लगीं। जब वह स्कूल पढ़ने के लिए जाती थीं तो लोग उन पर अभद्र टिप्पणियां किया करते थे। यहां तक कि उन्हें पत्थरों से भी मारा जाता था और उन पर गोबर फेंका जाता था। इसीलिए वह अपने साथ दो साड़ियां लेकर चलती थीं, ताकि एक गंदी हो जाये तो दूसरी को पहन सकें। अपनी पढ़ाई के बाद सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक बनने का प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय प्रारंभ किया।
आज वर्तमान में जो महिला सशक्तिकरण हो रहा है उसका श्रेय सावित्री बाई फुले जी को जाता है। शांतम प्रज्ञा आश्रम के संचालक मुकेश कुमार सेन ने बताया कि सावित्री बाई फुले जी का पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित रहा।
उन्होंने संघर्षों के साथ रूढ़ीवादी परंपरा को तोड़ने के लिए निरंतर संघर्ष किया। बिना पुरोहितों के शादी और दहेज प्रथा को हतोत्साहित करने के साथ – साथ अंतरजातीय विवाह करवाने के लिए उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर सत्यशोधक समाज की स्थापना की। सावित्रीबाई और ज्योतिराव की कोई संतान नहीं हुई। इसलिए उन्होंने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंत राव को गोद ले लिया था।जिसका उनके परिवार में काफी विरोध हुआ तब उन्होंने परिवारवालों से अपने सभी संबंध समाप्त कर लिया।
आज समाज में किसी भी क्षेत्र में महिला पुरुषों से पीछे नहीं है।
समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का योगदान बढ़ रहा है राजनीति ,खेल ,मनोरंजन,कला,संगीत,विज्ञान अन्य सभी क्षेत्रों में महिलाएं महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं देकर देश का नाम रोशन कर रहीं है। आज समाज को सावित्री बाई फुले जी जैसी समाज सुधारकों की आवश्यकता है।
इस अवसर पर रूपेश पिंटू पटेल नगर उपाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी पिछड़ा वर्ग मोर्चा,सुनील पटेल महामंत्री भाजपा , शांतम प्रज्ञा आश्रम के संचालक मुकेश कुमार सेन,राकेश सेन,संतोष अहिरवार,चंचल गौतम,अजय सोनी उपस्थित रहे।

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