जानें बारह सौ वर्ष पुराने मंदिर का इतिहास और क्या है..मान्यता

नंदकिशोर ठाकुर, डिंडोरी ब्यूरो। जिले के जनपद पंचायत समनापुर अंतर्गत ग्राम पंचायत कुकर्रामठ गांव में स्थित प्रसिद्ध ऋणमुक्तेश्वर शिव मंदिर में पिछले दिनों सावन के तीसरे सोमवार को दिनभर भक्तों का तांता लगा रहा। बताया गया कि सुबह से देर शाम तक मंदिर में श्रद्धालुओं का पहुंचे का क्रम जारी रहा, कावड़ यात्रा में शामिल भक्तों ने नर्मदा से जल भरकर शिव मंदिर में चढ़ाकर विधि विधान जल अभिषेक करते हुए नजर आए, पूजा पाठ के दौरान मंदिर में स्थित शिवलिंग की विशेष पूजा अर्चना कर आरती की गई। गौरतलब है कि जिला मुख्यालय से पंद्रह किलोमीटर दूर स्थित कुकर्रामठ मंदिर को ऋणमुक्तेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की पूजा और दर्शन करने से पितृ-ऋण, देव-ऋण और गुरु-ऋण से मुक्ति मिलती है। वर्ष में पड़ने वाले महाशिवरात्रि, नागपंचमी समेत अन्य धार्मिक त्योहारों पर जिले भर के दूर-दूर से भक्तगण दर्शन करने के लिए आते हैं।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है, अलग अलग मान्यता।
पुरातत्व विभाग के मुताबिक ऋणमुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण 10 वीं और 11 वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है, कुछ लोग मंदिर का निर्माण 8 वीं सदी में बनने का दावा भी करते हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मंदिर का निर्माण कल्चुरी कालीन है, जहां मंदिर एक विशाल चबूतरे पर बना है। मंदिर के गर्भगृह में एक विशाल शिवलिंग विराजमान है तथा मंदिर के मुख्य द्वार के सामने नंदी की प्रतिमा है। मंदिर में तीन ओर अन्य प्रकोष्ठ बने है, जिनमें संभवतः कभी मूर्तियां स्थापित रहने का अनुमान है, मंदिर की दीवारों पर मूर्तियां बनी साफ नजर आती हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो मंदिर परिसर में कुछ साल पहले तक भगवान विष्णु, रामभक्त हनुमान, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, नर्मदा की प्रतिमा, शेर, कुत्ता सहित अन्य की प्रतिमाएं होने का दावा भी कर रहे हैं। गौरतलब है कि इनमें से कुछ प्रतिमाएं वर्तमान में नर्मदा के उद्गमस्थल अमरकंटक के किसी संग्रहालय में रखी है और कुछ प्रतिमाएं कुकर्रामठ मंदिर के पास ही सुरक्षित रख दी गई हैं। इन प्रतिमाओं को पुनः स्थापित करने लगतार प्रयास भी किए जा रहे हैं। वर्तमान में मंदिर का रखरखाव मप्र पुरातत्व विभाग करता है, पुरातत्व विभाग ने प्राचीन स्मारक पुरातत्वीय स्थल को सुरक्षा अधिनियम 1958 के तहत मंदिर को संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
1904 में अंग्रेजी हुकूमतों ने करवाएं थे मरम्मत के कार्य ।
ऋणमुक्तेश्वर मंदिर के पास ही पुरातत्व विभाग का एक शिलालेख भी लगाया गया है, जिसमें मंदिर के इतिहास को संक्षिप्त में लिखा गया है। पुरातत्व विभाग के द्वारा कुछ वर्ष पहले ही मंदिर की सुरक्षा के लिए मंदिर के चारों ओर दीवार बनाई गई है। वर्षों पहले मंदिर के संरक्षण की दिशा में सबसे पहला प्रयास अंग्रेजी हुकूमत के वक्त 1904 में अंग्रेजों ने किया था। आजादी के बाद 1971 में भारत सरकार ने एक बार फिर इसकी मरम्मत करवाई। इसके बाद 2010 में भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा मंदिर की सुरक्षा के लिए एक बार फिर से प्रयास किए हैं। कुछ इतिहासकारों ने मंदिर का निर्माण कल्चुरी नरेश कौकल्यदेव के सहयोग से तात्कालीन शंकराचार्य ने गुरुऋण से मुक्त होने के लिए मंदिर का निर्माण होने का दावा करते हैं। कुछ इतिहासकार मंदिर का निर्माण स्वान अर्थात कुत्ते को समर्पित है, चूंकि कुत्ते को कूकुर भी कहा जाता है, इसलिए मंदिर को बाद में कुकर्रामठ गांव का नाम भी मिला, जहां ऋणमुक्तेश्वर मंदिर है। बताया जाता है कि वर्षों पहले एक बंजारे को पैसे की आवश्यकता पड़ी, उसने पैसे के बदले किसी साहूकार के पास अपने वफादार कुत्ते को गिरवी रख दिया। समय गुजरने के साथ ही एक दिन साहूकार के घर में कुछ चोर चोरी करने के लिए घुसे, वफादार कुत्ता यह सब चुपचाप देख रहा था। चोरी करने के बाद चोर बाहर निकले तो कुत्ता भी उनके पीछे-पीछे गया, चोरों ने चोरी का सारा धन एक तालाब के भीतर छिपा दिया। सुबह जब साहूकार की नींद खुली तब उसे पता चला कि उसके घर चोरी हो गई है। कुत्ता साहूकार के पास जाकर भोंकने लगा और उसकी धोती पकड़कर तालाब के पास ले गया और तालाब के भीतर छिपाए गए चोरी के धन को मुंह से निकालकर सामने रख दिया। इस पर साहूकार ने खुश होकर स्वान व उसके मालिक को ऋण-मुक्त कर दिया और ऋण-मुक्ति संबंधित एक पत्र लिखकर उसके गले में टांगकर मालिक के पास भेज दिया। संयोग से बंजारा भी कुत्ते को ऋण-मुक्त कराने आ ही रहा था और कुत्ता उसे रास्ते में मिल गया, बंजारे को लगा कि स्वान साहूकार के घर से भाग आया है, उसे क्रोध आ गया और उसने स्वान पर तेज वार किया, जिससे स्वान की मौत हो गई। फिर बंजारे की नजर कुत्ते के गले में बंधे ऋण-मुक्ति पत्र पर पड़ी तो वह पढ़कर रोने लगा। उसे बेहद अफसोस हुआ और उसने कूकुर की स्मृति में मठ का निर्माण कराया और साथ ही स्वान की मूर्ति भी बनवाई। मंदिर का निर्माण कुछ इतिहासकार महाभारत काल से जोड़कर भी देख रहे हैं।



