गीता ज्ञान दाता स्वयं को काल बताता है

जबलपुर दर्पण। अध्याय 11 के श्लोक 32 में काल भगवान कह रहा है कि मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ। इस समय लोकों को नष्ट करने के लिए आया (प्रकट हुआ) हूँ। जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहंेगे अर्थात् मैं खा जाऊँगा। अध्याय 11 के श्लोक 33, 34 में कहा है कि अतःएव तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीत कर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब पहले ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं। अर्जुन (सव्यसाचिन – बाँए हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से ‘‘सव्यसाची‘‘ नाम अर्जुन का पड़ा) तू केवल निमित्त मात्र बन जा। तू वैरियों को जीतेगा। युद्ध कर।
अध्याय 11 के श्लोक 35 में संजय ने कहा कांपता हुआ अर्जुन भयभीत हो कर प्रणाम करता हुआ भगवान कृष्ण (क्योंकि अर्जुन मान रहा था यह कृष्ण है परंतु वह तो काल था) के प्रति गद्-गद् वाणी बोला अध्याय 11 श्लोक 36 में – हे अन्तर्यामी! भयभीत राक्षस दिशाओं में भाग रहे हैं। सिद्धगणों का समूह नमस्कार कर रहा है।
अध्याय 11 के श्लोक 37, 38 में अर्जुन कह रहा है कि हे ब्रह्मा के भी आदिकत्र्ता महान आत्मा! आपको क्यांे न नमस्कार करें? हे जगन्निवास! आप सत्-असत् उनसे भी परे अक्षर वह आप हैं। (डरता अर्जुन काल को सर्वस्व कह रहा है) अध्याय 11 के श्लोक 39 में अर्जुन कह रहा है कि आप ही ब्रह्मा के पिता हैं (अर्थात् काल ही ब्रह्मा का पिता हैं) आपको बार-2 नमस्कार हो। अध्याय 11 के श्लोक 40 से 44 तक में अर्जुन कह रहा है कि मेरे से भूल हो गई कि मैंने आपको सीधा नाम से हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे (साथी) अर्थात् साला इस प्रकार हठात् कहा तथा आम साथियों के सामने ऐसा कह कर अपमानित किया। मैं क्षमा चाहता हूँ। आप सबसे बड़े गुरु हैं। आपसे बड़ा कोई नहीं है। मैं आप ईश्वर को प्रणाम तथा प्रार्थना करता हूँ। आप क्षमा करो। आप हमारे सर्व अपराध सहन करने वाले हो। यह सब वचन अर्जुन विशेष भयभीत हो कर कह रहा है। अध्याय 11 के श्लोक 45 में अर्जुन कह रहा है कि पहले न देखे हुए आपके इस विराट (काल) रूप को देख कर मैं (अर्जुन) हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। आप उस देव रूप को मुझे दिखाईये। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होईए।
अध्याय 11 के श्लोक 46 में अर्जुन कह रहा है कि मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए, गदा चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे विश्वरूप! सहस्राबाहो (हजार भुजा वाले) उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट होईए। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता हजार भुजाओं वाला काल ब्रह्म है। श्री कृष्ण तो श्री विष्णु जी थे जिनकी चार भुजा हैं। चार भुजा वाला दो भुजा बना सकता है, परंतु हजार नहीं बना सकता। हजार भुजा वाला भगवान चार भुजा, दो भुजा बना सकता है। ।। ब्रह्म (काल) भगवान की प्राप्ति अति असंभव।। अध्याय 11 के श्लोक 47-48 का सारांश:- अध्याय 11 के श्लोक 47 में काल भगवान ने कहा है कि हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर यह सीमा रहित विराट (आदि काल) रूप आपको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था। 48 में कहा है कि हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार (विश्वरूप वाला) मैं न वेदों के अध्ययन से अर्थात् वेदों में वर्णित विधि से साधना करने से, न यज्ञों से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ। अर्थात् मैं (काल कह रहा है) किसी भी प्रकार की साधना से किसी द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता।
विचार करें:- भगवान काल (ब्रह्म) स्पष्ट करता है कि मेरी प्राप्ति असम्भव है। महाभारत में प्रमाण मिलता है कि जब भगवान कृष्ण कौरव- पाण्डवों का समझौता करवाने के लिए गए थे तो दुर्योंधन उलटा बोला था। तब श्री कृष्ण जी ने विराट रूप दिखाया था। फिर यहाँ पर कह रहा है कि अर्जुन तेरे अतिरिक्त किसी ने मेरा यह विराट रूप पहले नहीं देखा। इससे सिद्ध है कि यह रूप काल ने दिखाया था। वह महाभारत में श्री कृष्ण जी ने दिखाया था। इसलिए गीता श्री कृष्ण जी ने नहीं बोली, यह काल (ब्रह्म) ने बोली थी। दोनों विराट रूपांे में बहुत अंतर था और विचार पूर्वक सोचें तो संजय भी विराट रूप को आँखों देख कर धृतराष्ट्र को बता रहा है। फिर यह कहना कि तेरे अतिरिक्त किसी के द्वारा नहीं देखा जा सकता। यही सिद्ध करता है कि काल भगवान ने गीता का ज्ञान दिया है न कि श्री कृष्ण जी ने। अध्याय 11 के श्लोक 49 में भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू मूर्खों की तरह इस विकराल रूप को देख कर डर मत। भय रहित होकर उसी (चतुर्भुज रूप को) रूप को फिर देख।
अध्याय 11 के श्लोक 50 में संजय कह रहा है कि फिर भगवान ने मनुष्य (कृष्ण) रूप में हो कर डरे हुए अर्जुन को आश्वासन दिया।
अध्याय 11 के श्लोक 51 में अर्जुन ने कहा है कि हे जनार्दन! आपको पहले चतुर्भुज रूप में फिर अब मनुष्य रूप में देख कर अब स्वाभाविक स्थिति में (भय रहित) हो गया हूँ।



