साक्षी का साक्षी (गवाह) कौन?

दिल्ली में जो हुआ वह बोध कराता है कि इंसान कितने पत्थर होते जा रहे हैं। मासूम साक्षी की निर्मम हत्या न जाने कितनी दफा मानवता की कसौटी को त्रस्त कर दिया। हम इंसान बस इसी लिए श्रेष्ठ थे कि हमारे पास अपना विवेक है हृदय में प्रेम है सद्भावना और जीवन्तता है।
मगर हाल ही में जो हुआ उसके लिए समस्त मानव जाति को डूब मरना चाहिए। उस क्रूर अतातायी जैसे न जानें कितने होंगे जिसने प्रेम शब्द और इस पावन भाव का दुष्कर्म कर डाला उसके अर्थ को बिगाड़ के रख दिया। और मुझे यह कहते हुए बेहद खेद है कि मानवता और प्रेम के इस अभाव में यह धरती जल्द ही निर्दोषों के खून से लबालब भरी हुई किसी दलदल में गिर जायेगी।
इस नृशंसता के लिए इस क्रूर को निश्चित ही हजारों बार मृत्यु दी जानी चाहिए जिसने अपनी आत्मा अपना धर्म बेचकर उस मासूम को तड़पा तड़पाकर मारा।
जिस क्षण यह दुष्कृत्य हो रहा था उस क्षण न जाने कितनी जिंदा लाशें उस रास्ते से गुजर रहीं थी लेकिन एक बार भी किसी के भीतर से यह आवाज नहीं आई कि इस मासूम को बचा सकें। वह बेचारी मदद किए गुहार लगाती रही लेकिन वहां से गुजर रहे किसी भी नपुंसक ने उसकी मदद नहीं की और यहीं पर यह सिद्ध हो गया कि कैसे एक क्रूर व्यक्ति पूरी मनुजता पर भारी पड़ गया।
हम अपनी डिग्रियां अपना कौशल अपनी शिक्षा का क्या करेंगे? यह सब बेकार है यदि हमारे पास मानवता और आत्मिकता की शक्ति न हो। जिम में शरीर बनाने का क्या फायदा जब तुम्हारी भुजाएं किसी तड़पते हुए का सहारा न बन सकें। ऐसी उन्नतियां किसी काम की नही जिसे भोगने वाला जीव जगत का अस्तित्व भी खतरे में हो। सब बेकार है।
हम मानवता का गला घोंटकर धर्म और मजहब बचाने निकले है, इससे अच्छा होगा कि हम सभी ज़हर खा लें और इस देह को भी समाप्त कर डालें क्योंकि यहां सिर्फ देह ही जिंदा है आत्मा तो कबकी मर चुकी है लोगों की।
प्रेम तो जीवन का पर्याय है पर हमने कभी नहीं जाना कि जहां अपना सर्वस्व सौंप दिया जाता, जो समर्पण का सूचक है ऐसे हार्दिक भाव को हम इतने बुरे ढंग से जी रहें हैं। जिसे प्रेम होना चाहिए वही आज लव जिहाद बन गया है।
इस निष्प्राण कृत्य को जानने के बाद मैं जितना अभिव्यक्त करना चाहूं कम है। मैं नि: शब्द हूं।
और एक बार अपने अंतर्मन से समस्त मानवजाति को धिक्कारने का जी चाह रहा कि,
हे मूक शरीरों! डूब मरो।
खेद है मनुजता पर। 😓
- दीपक चौरसिया ईशदीप
बस्ती उत्तर प्रदेश



