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समाज को प्रकृति केंद्रित विकास की ओर मुडऩा होगा: केएन गोविन्दाचार्य

नर्मदा दर्शन व अध्ययन प्रवास पर मण्डला पहुंचे गोविन्दाचार्य
मण्डला।
देश के प्रख्यात चिंतक विचारक, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रणेता, पर्यावरणविद केएन गोविंदाचार्य का 21 फरवरी को मण्डला आगमन हुआ। श्री गोविंदाचार्य वाहन से मां नर्मदा परिक्रमा पथ पर अध्ययन यात्रा कर रहे हैं। मण्डला आगमन पर उनके प्रसंशकों ने भव्य स्वागत किया, उन्होंने माँ नर्मदा संगम तट में भारतीय जीवन दर्शन पर आधारित विकास की संकल्पना विषय पर स्थानीय नागरिकों एवं स्वयंसेवी संगठनों कार्यकर्ताओं के साथ संगोष्ठी एवं संवाद किया।
समृद्धि और संस्कृति का संतुलन ही विकास है-श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि भारतीय जीवन दर्शन पर आधारित विकास की संकल्पना से आशय है कि शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा का संतुलित सुख। मनुष्य की आंतरिक एवं बाहरी अमीरी का संतुलन बना रहे। तदनुसार सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यवस्था हो। उस को परिपोषित करने के लिए शिक्षा और संस्कार की व्यवस्था हो। समाज में समृद्धि और संस्कृति का संतुलन बना रहे वही सही विकास है। विकास की अवधारणा समाज से जुड़ी है। हम कैसा समाज चाहते हैं, इसी से तय होगा कि विकास हुआ या नहीं। यह विकास मानव केंद्रित न होकर प्रकृति केंद्रित होता है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जमीन, जल, जंगल, जानवर और जन का परस्पर संपोषण होता रहे। व्यक्ति का परिवार, पड़ोस, समाज, दुनिया और प्रकृति के साथ तालमेल बना रहे। वही तकनीक सही मानी जाएगी जो आर्थिक पक्ष के साथ-साथ संस्कृति और प्रकृति का भी ध्यान रख सके।
मानव का देवत्व की ओर बढऩा विकास है-उन्होंने भारतीय संस्कृति पर आधारित प्रकृति केंद्रित विकास की अवधारणा को समझने या मापने के पैमानों पर चर्चा करते हुये कहा कि कृषि भूमि का उपजाऊपन बढ़ता रहे, भूमिगत जल का स्तर ऊपर उठता रहे, वनों और उपवनों का आच्छादन बढ़ता रहे, मनुष्य-पशु में पशुओं का अनुपात बढ़ता रहे तो यह विकास है परन्तु भूमि का उपजाऊपन घटना, भूमिगत जल का स्तर गिरना और मनुष्य की तुलना में पशुओं का अनुपात घटना विकास नहीं विनाश है। मानव का देवत्व की ओर बढऩा विकास है, पर मानव की पशुता की ओर बढऩा विनाश है। धर्मसत्ता, राजसत्ता और अर्थसत्ता में संतुलन और स्वायत्तता बनी रहे तो वह विकास है, पर राजसत्ता या अर्थसत्ता या धर्मसत्ता का निरंकुश हो जाना विनाश है। समाज में परिवार इकाई का मजबूत होते जाना विकास है, पर परिवार का विखंडन होते जाना विनाश है।
भारतीय संस्कृति में है जलवायु परिवर्तन के संकट से उबारने का सामर्थ्य-श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि विकास की विकृत अवधारणा से उपजे जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृति के असंतुलन से देश के हिन्दी भाषी क्षेत्र ज्यादा प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि इस विकराल संकट से उबारने का सामथ्र्य भारतीय संस्कृति के प्रकाश में उपलब्ध विकल्प-प्रकृति केंद्रित विकास में है। पहले उसे भारत के राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने का पुरुषार्थ करने की चुनौती आज हमारे सम्मुख है। उन्होंने कहा कि हम उस चुनौती को स्वीकारें और मानवता के एक आदर्श खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़े, यही आज हमारा कर्तव्य है। संगोष्ठी में नरेश ज्यातिषी, गिरजा शंकर अग्रवाल, पूज्य स्वामी देवस्वरूपानंद महाराज मंचासीन रहे। आभार प्रदर्शन अभिनव सिहारे ने किया इस दौरान नर्मदा सेवक, पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी, प्रबुद्ध जन, मीडिया के विभिन्न क्षेत्र के पत्रकार एवं स्वयंसेवी संगठन के कार्यकर्ता उपस्थित रहे। श्री गोविन्दाचार्य ने अपने मण्डला प्रवास के दूसरे दिन सोमवार को प्रात: तुलसी तपोवन आश्रम सुरंगदेवरी में पत्रकारों से चर्चा के उपरांत वे घंसौर के लिए रवाना हो गए।

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