खास खबरसंपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण

फिर बदला मंजर…

कोई किस्त है जो अदा नहीं है,
साँस बाकी है पर हवा नहीं है।
नशीहते, हिदायते, सलाह, तमाम हैं,
प्रिश्किपसन है पर दवा नहीं है।
आँख भी ढक लीजिये संग मुँह के,
मंजर सच मुच अच्छा नहीं है।
डॉ. है पर हॉस्पिटलों में जगह नहीं है,
शमशान है पर जलाने को लकडि़याँ नहीं।
मौसमों का रूख बदला नहीं,
सड़कों पर कोई दिखा नहीं।
यू ही हर मजबूर रोटी को तरसा रहा
महीनों से दुकानों का शटर खुला नहीं।
अब यूहीं घर से निकलना नहीं अच्छा,
करोना का कहर अभी थमा नहीं।
शादियों में वो मजा नहीं,
बैंड बाजो का पता नहीं।
चौराहों पे सिवा पुलिस के कोई थमा नहीं।
बिन कमाए गुजर नहीं,
यू ही नदियों का पानी झिरा नहीं।
घाटों पर कोई मिला नहीं,
देवी दर्शन को कोई गया नहीं।
मंदिरों का पट खुला नहीं।
अब तो सिर्फ दुआ के कुछ बचा नहीं,
सच मुच ये मंजर अच्छा नहीं…।

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