संपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण

“मां की मेहरबानियां”

निर्मल सीतलमयी सुकून की निष्कंटक अडिग ये छाया है।
जिसके सामने विफल ये दुनिया की सारी मोह माया है।
कहने को तो दुनिया में बहुत सारे सब अपने है।
बाकी मां कि निश्चलता के सामने सब सपने है।
स्नेह प्रेम करुणा की अथक अथाह महासागर है।
जिसकी विशालता का अनुमान लगा पाना छोटा गागर है।
मामत्त्व एवं हृदय की गहराई बहुत ही गहरा गर्त है।
जिस गहराई की तुलना कर पाना बहुत ही व्यर्थ है ।
संतान की खातिर हर बड़े कष्टों को छोटा समझ जिया है।
जिनके लिए हर बड़ी विपदा को अमृत समझ पिया है।
सुरक्षा और संरक्षा अमिट ओजोन परत से भी मूल है।
और तो बाकी दुनिया के दिखावे जो उड़ती धूल है।
विशालता एवं परायणता में हिमालय शिखर भी नतमस्तक है।
बाकी की ऊंचाइयां भी इस काबिले सब बुड़बक हैं।
भगवान सदा सलामत रखें यह जो हिफाजत की मूरत है।
जिसके सामने फीके पड़े संसार के यह सब तीरथ हैं।
संसार के हर रिश्ते कुछ छड़ मात्र के रमणीय है।
मां की त्याग करुणा सहनशीलता सदा ही वंदनीय है।

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