साहित्य दर्पण

 बेटी

नन्ही सी गुड़िया ने आकर ,
मेरा घर है महकाया ।
गुमसुम सी जो रहती थी,
उन गलियों को था चहकाया ।
मेरे बचपन को था उसने,
अपने जीवन में मिलवाया ।
पाकर उसको मैंने मानो ,
सारा जग था उस पल पाया।
जैसे कोई स्वप्न सुनहरा,
जीवन में था पूर्ण हो आया।
कुछ ऐसी वो नन्ही कली है,
जिसने मुझ को पूर्ण बनाया।
ख्वाबों के जब आसमान में ,
नन्हे पंखों को उसने फैलाया।
देख उमंगे उसके भीतर,
बचपन मुझे अपना याद आया।
अल्हड़ सी मेरी दुनियाँ को,
जिम्मेदारी था समझाया ।
मौन में तोड़ू अब तो अपना,
ये था तब उसने सिखाया।
नन्ही सी गुड़िया ने आकर ,
मेरे घर को महकाया।।

पूनम शर्मा स्नेहिल

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