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न्यायालय के आदेश की अनदेखी कर कर दिया नामांतरण।

न्यायालय के आदेश की अनदेखी कर कर दिया नामांतरण।
पाटन तहसील दार विषय पर कुछ भी बोलने से इन्कार।
जबलपुर। आपसी विवादों के निपटारे के लिए आम आदमी को न्यायालय का सहारा होता है और न्यायालय यदि किसी प्रकरण पर कोई आदेश जारी करता है तो उसके अधीनस्थ व्यवस्था के सभी अंगों को उसका पालन करना होता है। उस आदेश को स्थगित या निरस्त करने का अधिकार भी उच्च न्यायालय को होता है।
यह सर्वविदित सत्य है कि राजस्व अधिकारियों के आदेश, न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते।
किंतु ऐसा ही एक मामला देखने में आया है पाटन तहसील के अंतर्गत।

आवेदिका कोमल बाई की तरफ से उनके वकील सोनेलाल पटेल के द्वारा मीडिया को जानकारी दी गई। जिसके अनुसार मृतक भागचंद की मृत्यु के बाद उनके वारिस के तौर पर, उनकी बहन कोमल बाई सामने आई। और जमीन पर वर्तमान अधिकार भी उन्हीं का था। ओमकार यादव द्वारा जमीन की वसीयत के कागजात का इस्तेमाल करके। जमीन का भू स्वामित्व हासिल करने की कोशिश की जा रही थी।
ओमकार यादव के अनुसार भागचंद ने मरने से पहले वसीयत में जमीन उसके नाम कर दी थी। इसी वसीयत के आधार पर उसने नामांतरण का आवेदन तहसीलदार पाटन की कोर्ट में दिया गया।
इस आवेदन के विरुद्ध पाटन सिविल कोर्ट में कोमल बाई ने दिनांक 13/7/2020 परिवाद दायर किया। और माननीय अदालत ने इस विषय में दिनांक 24/8/2020 को एक आदेश जारी किया। जिसके अनुसार ओमकार यादव द्वारा प्रस्तुत की गई वसीयत को निरस्त करते हुए, उक्त भूमि पर नामंतरण पर रोक लगाई। साथ ही जमीन पर, यथा स्थिति को बनाए रखना था।
अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त होते ही, पाटन तहसीलदार ने ओमकार यादव द्वारा लगाए गए, नामांतरण आवेदन को निरस्त कर दिया। किंतु इसके बाद दिनांक 5/11/2020 को ओमकार यादव भूमि के नामांतरण के लिए आवेदन दिया। और इस बार तहसीलदार पाटन द्वारा उक्त भूमि का नामांतरण 23/12/2020 ओम कार यादव पक्ष में दर्ज कर दिया गया।
इस विषय में विवाद के अगले अध्याय की शुरुआत यहीं से होती है। नामांतरण हो जाने के बाद ओमकार यादव उक्त जमीन पर कब्जे के लिए प्रयास करने लगा।
उक्त भूमि पर चने की फसल बोई गई थी। जिस पर ओमकार अपना अधिकार बताने लगा। अनुविभागीय अधिकारी पाटन के पास उसने उस फसल पर अपना दावा प्रस्तुत किया। इसके बाद चने की फसल अधिकारिक रूप से ओमकार यादव को दिला दी गई।
विवाद अभी बना हुआ है और स्थिति पहले से अधिक गंभीर हो गई है राजस्व अधिकारियों ने अदालत के आदेश की अनदेखी किस प्रकार की यह बात समझ से परे है।
इस विषय में तहसीलदार पाटन प्रमोद चतुर्वेदी और अनुभवी अधिकारी शाहिद खान से बात करने की कोशिश की गई। तो उन्होंने प्रकरण के न्यायालय में विचाराधीन होने का हवाला देते हुए। कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। लेकिन बड़ा सवाल ये उठता है, जिस भूमि के नामांतरण के पहले आवेदन को, अदालत के आदेश के आधार पर,पाटन तहसीलदार ने निरस्त कर दिया गया था। उसी भूमि के नामांतरण के अगले आवेदन को स्वीकार करते हुए। ओमकार यादव के नाम से नामांतरण किस प्रकार कर दिया गया?
इस नामांतरण के विरुद्ध कोमल भाई की ओर से धारा 80 के अंतर्गत तहसीलदार को नोटिस दिया गया।
किंतु इसका कोई जवाब प्राप्त नहीं हो पाया।
यह प्रश्न भी अनुत्तरित है कि यह प्रकरण जब अनुविभागीय अधिकारी पाटन के संज्ञान में आया। तो इस विषय में उनके द्वारा क्या कार्रवाई की गई?
इस मामले में पुलिस ने भी अदालत के आदेश को एक तरफ रख कर, उपलब्ध दस्तावेजों के अनुरूप कार्यवाही की।
जब थाना प्रभारी पाटन से इस विषय में पूछा गया। तो वो अपनी व्यस्तताओं के चलते, कुछ भी कह पाने में असमर्थ थे।

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