तो क्या तीसरे लहर की तैयारी पूर्ण हो चुकी है या फिर बेफिक्र है प्रभारी मंत्री…??

सम्भागीय ब्यूरो अनिल लहंगीर शहडोल। शहडोल जिले में दूसरी बार प्रभारी मंत्री का आना हुआ और इस आगमन में पहले आगमन से नाम मात्र का अंतराल था सवाल यह नही की प्रभारी मंत्री लगातार क्यों आ रहे हैं सवाल तो यह है कि क्या हम पूर्णतः कोरोना से जंग जीत चुके हैं और जीत चुके हैं तो फिर तीसरे लहर के लिए संशय क्यों सूबे के मुखिया को भी इस पर गौर फरमाना चाहिए जिस तरह लोग बेतरतीब हो चुके हैं उससे तो यह प्रतीत हो रहा है कि अब लोगों के मन से कोरोना का भ्रम खत्म हो चुका है और यह बात भी ठीक है पर क्या लोगों के चेहरे से मास्क उतरना और सेनेटाइजर का पूर्णतः उपयोग खत्म हो जाना यह कहाँ तक सही है इस बात की समझाइश स्वयं प्रभारी मंत्री और जिला प्रशासन को आमजनमानस देना चाहिए ताकि लोगों के मन मे जागरूकता बना रहे किन्तु प्रभारी मंत्री के दोनों कार्यक्रम में जिस तरह से भीड़ और लोगों के चेहरे से उतरे मास्को ने तीसरी लहर को निमंत्रण दिया यह भी एक सोचनीय पहल है आगामी भविष्य में किसी अनदेखी के प्रति किसकी जवाबदेही होगी स्वयं प्रभारी मंत्री की,जिला प्रशासन की या फिर सूबे के मुखिया की..??

चालान भी कटा मंत्री जी का पर ये भी विचारणीय-सवाल और सोचनीय पहलू ये है कि जिस प्रभारी मंत्री के काफिले के आगे पीछे पूरा जिला और पुलिस प्रशासन तयनाथ था उस वक्त मंत्री जी के वाहन का 500 रु का चालान कटा जबकि चालान के सांथ गाड़ी में लगे फ़िल्म को भी उतारना चाहिए किन्तु महज दिखावा चालान काटना किस हद तक सही है जिस चालान की कार्यवाही जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को करना चाहिए वह कार्यवाही सूबेदार कर गए खैर यह भी दात देने वाली बात है।
जमकर माखौल उड़ा शोषल डिस्टेंसिंग का-अगर मंत्री जी के दोनों कार्यक्रमों की सूची और आंकड़े उताए जाएं तो यह ज्ञात हो जाएगा कि भारी भरकम भीड़ ने मंत्री के कार्यक्रम में चार-चांद लगा दिया पर इस बीमारी के बीच चार-चांद लगना तिल का ताड़ से कम नही है जहां मंत्री जी के चेहरे पर मास्क दिखा वहीं छुटभैये नेताओं के चेहरे से मास्क नदारद थे सेल्फी लेने और फोटो सेशन में मशगूल उन नेताओं ने जरा भी यह नही सोचा कि हम कोरोनाकाल से जूझ रहे हैं और तीसरे लहर की तैयारी में हैं किंतु इस ओर न ही जिला प्रशासन ध्यान आकृष्ट कर रहा है और न ही सरकार के नवनियुक्त प्रभारी मंत्री
मंत्री के कार्यक्रम में पत्रकारों की भी अनदेखी-जिले में पत्रकारों की संख्या गली कूंचों में सुमार है ऐसे में एक छोटे से कमरे में पत्रकारों को यूँ ही भेड़-बकरियों की तरह छोड़ देना यह भी एक सोचनीय पहलू है वहीं दर्जनों पत्रकारों के सवालों के जवाब पूर्व की भांति मंत्री जी कन्नी काट गए और किसी को संतुष्ट तो किसी को असंतुष्ट कर गए इसी बीच कई पत्रकार बन्धु ऐसे भी थे जिनके जहन में कुछ सवाल थे पर इन सवालों को मन के अंदर ही मारकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की प्रासंगिकता को खत्म कर दी गई कई पत्रकार बन्धु अपने सवालों के जवाब खुद ही ढूंढते रहे क्योंकि मंत्री जी तो ऐसे की सौ सवालों के जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी की सैकड़ो जवाबों की आबरू रख ली यह कोई नई बात नही पत्रकार का काम है सवाल पूंछना और और सरकार और प्रशासन का काम है उन सवालों का जवाब देना। बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हमने तीसरे लहर की क्या तैयारी की है।



