जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

रवि की किरणें सुखदायी करते है सबकी भलाई

लालाजी की आठवीं संतान परम आदरणीय प्रो रवीन्द्र मक्कड़ का जन्म 2 मई 1950 को दिल्ली से सटे, नूहमंडी जिला गुरुग्राम हरियाणा में हुआ। बचपन में चंचल थे।। बच्चों को मर्यादा में रखने के लिए उस समय माता-पिता उनकी पिटाई भी कर दिया करते थे। प्रो रवीन्द्र मक्कड़ जिन्हें बचपन से माता पिता लाड से रवि बुलाया करते थे, वे भी खूब पिटे। एक बार एक पैसा चोरी करते हुए और एक बार आलस करते हुए वे खूब पिटे। पिताश्री कि यह पिटाई नहीं थी परन्तु एक शिक्षा थी जिनसे रवि जी एक निष्ठावान,कर्मक्षम‌,कर्मठ और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला इंसान बनकर निकला, जो आज देखने को मिलता है। शनै: शनै: बड़े हुए । आठवीं कक्षा नूह मंडी से करके रवि सर जबलपुर में आ बसे। 1968 में हितकारिणी विद्यालय से 11वीं कक्षा में प्रथम स्थान से उत्तीर्ण हुए। यहां भी बड़े भाई से पिटे, इसलिए कि जिले में प्रथम आना था। ये भी पिटाई नहीं थी परंतु कर्मक्षेत्र पर अग्रसर होने के लिए एक उचित दिशा थी। कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय जे एन के वी वी जबलपुर‌ से 1973 में‌ बी टैक उत्तीर्ण होकर वहीं पर सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हुए। जनवरी 1976 में आप और पग पग साथ देने वाली हमकदम शारदारानी एक सूत्र में बंधे। समय रहते आज्ञाकारी होनहार रत्न एक बेटी और दो बेटे‌ हुए। 1981 में एम टैक किया और गोल्ड मेडल प्राप्त किया। खिलखिलाते जीवन मे अचानक नवंबर 2000 में रवि सर एक असाध्य बीमारी हैपीटाइट्स बी से रोगग्रस्त हुए। अभीतक आप जीवन की मौज मस्ती में होटल, रेस्टोरेंट, घूमना फिरना आदि में व्यस्त थे। नशा भी करते थे। इस असाध्य रोग होने से डॉक्टरों ने आपको कहा कि आप नहीं बचेंगे। लेकिन मातारानी की असीम श्रीकृपा से काल के गाल से वापस आ गए। सभी को आश्चर्य हुआ लेकिन सबकी पवित्र दुआओं ने इन्हें नई जिंदगी दे दी। वो तो इसे भी पूज्यनीय पिताश्री द्वारा की गई वो पिटाई अर्थात वो शिक्षा को वरदान ही मानते है , जो रवि सर को दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदान की थी वो काम आई। डाक्टर हैरान थे कि रवि बच कैसे गये । 25 साल पूर्ण होने पर शादी हुई, 25 से 50 वर्ष के मध्य गृहस्थी का क्रम चला, और जैसे ही 51 वर्ष में प्रवेश किया मातारानी ने रवि जी पर कृपा कर दी। यह रोग रवि को अभिशाप नहीं वरदान सिद्ध हुआ । केवल शाकाहारी बन कर रह गये रवि, नशा आदि सब छूट गया। फिर क्या था रवि सर जुट गये धार्मिक आयोजनों में राजराजेश्वरी मंदिर रामनगर अधारताल में, और श्री गुरु सिंह सभा अधारताल गुरुद्वारा में। साथ साथ माता की गीत भी लिखने लगे। कविता का कुछ भी ज्ञान नहीं था किस नियम के तहत लिखी जाती है, परंतु लिखने में पूर्ण समर्पित हो गये। गुरुद्वारा और मंदिर के विकास में पूरी तरह निष्ठावान और कर्मठ हो कार्य करने लगे। यहां भी पिताश्री कि वो पिटाई वाली शिक्षा रवि सर को साधक बनाने में जुटी। अनिच्छा से गुरुद्वारा में भी और मंदिर में भी पद स्वीकार कर , फिर शीघ्र छोड़ दिए। उन्हें तो केवल मां के गीत लिखने में और सेवा भाव में आनंद आता रहा । शीघ्र ही रवि सर ने अपने तीनों बच्चों के विवाह कर दिए और आज उन तीनों बच्चों के एक एक पुत्र है। रवि जी जब अधारताल में रहते थे तो हर रविवार को वो मंडी से सब्जी लाया करते थे। एक बार टमाटर वाले ठेले से टमाटर लेते हुए ठेले से एक टमाटर नीचे गिर गया। रवि ने इस टमाटर को अपने थैले में रख लिया और घर चले आये । जैसे ही रवि सर को अपनी भूल का आभास हुआ वे पश्चाताप करने लगे। पूरे सप्ताह प्रायश्चित में डूबे रहे । पिताश्री की निष्ठावान होने की वो पिटाई स्मरण होती रही। अगले रविवार को रवि सर टमाटर बेचने वाले के पास गये, टमाटर खरीदे और एक टमाटर उसको दिया और हाथ जोड़कर क्षमा याचना करते हुए कहा कि मुझसे यह गलती हो गई है। रवि जी ने अपने जीवन की एक घटना और बताई। यह घटना 1972 की है जब रवि सर अविवाहित थे। रवि अपने पिताश्री के संग नेपियर टाउन में डेरी चलाया करते थे। उस समय वे कॉलेज में पढ़ने जाया करते थे और सुबह 4 बजे उठकर डेरी भी चलाया करते थे। उस डेरी के सामने एक कुआं था । सुबह के लगभग 6 बजे थे कि कुऐं से आवाज आई बचाओ बचाओ बचाओ । रवि लुंगी पहने हुए दौड़े चले गये कुएं के पास। आनन-फानन में उन्होंने लुंगी खोली और कुऐं में लटका दी, क्योंकि कुआं लबालब भरा था, तो जो कुएं में कूदा था उसने वह लुंगी पकड़ ली। जबतक अन्य लोग नहीं आए तबतक रवि लुंगी को पकड़े खड़े रहे। जैसे ही अन्य लोग आए रवि सर अपने काम पर पुनः वापस लग गये। इसी प्रकार एक घटना उनके मित्र दिलीप की शादी में हुई । बारात भोपाल से वापस लौट रही थी। सुबह के 7 बजे थे कि अचानक रास्ते में गाय को बचाते हुए बस एक नदी के किनारे एक पेड़ पर पलट कर रुक गई। सभी को और दिलीप की दुल्हन को जैसे-तैसे बस की खिड़की के कांच तोड़कर बाहर निकाला गया। फर्नीचर पूरा तहस-नहस हो गया था। रवि सर ने जब यह दृश्य देखा तो अचानक उसके मुख से निकला भाभी बहुत भाग्यशाली है कि हम सब बच गए‌। सभी ने एक स्वर में हां में हां मिलाई। अन्यथा हमारे संसार में इसके उलट ही बात कही जाती है। रवि सर मई 2015 में सेवानिवृत्त हुए। नवंबर 2017 में अजय सत्य प्रकाश होम्स, तिलहरी में अपने ही खूबसूरत आशियाने में सपरिवार आ बसे । आजकल उन्हें हर इंसान अच्छा लगता है चाहे वो कैसा भी हो । एक दिन मैंने पूछ ही लिया आप हर इंसान को अच्छा बोलते हो और सबसे कहते हो कि आप बोलो ‘ मैं बहुत अच्छा हूं’ ‘मैं बहुत अच्छी हूं’ कारण बताएं । रवि सर ने बताया कि एक दिन वो चिंतन में थे कि भगवान पत्थर की मूर्ति हैं और हम सब इस पत्थर की मूर्ति को पूरे मनोयोग से पूजते हैं। और संसार में जितने भी प्राणी है वे सब भगवान की ही तो रचना हैं। जब हम भगवान की पत्थर की मूर्ति को पूरी श्रद्धा भक्ति से पूजते हैं तो भगवान की जीती जागती कृति इंसानों को हम क्यों नहीं सम्मान देते। उस दिन से मैं हर इंसान को इसलिए सम्मान देता हूं कि वह भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं। इसलिए मैं हर इंसान को अच्छा कहता हूं और उन्हें भी प्रेरित करता हूं कि वे भी अपने गुणों को पहचाने अपने अंदर की प्रतिभाओं को जाने कि वो बहुत अच्छे हैं। मैंने रवीन्द्र सर के इन सकारात्मक भावों को जब जाना तो मैं किमकर्त्तव्यीमूढ़ हो गया। रवि सर किसी के प्रति कोई भी गलत धारणा नहीं रखते। कहते हैं जब कोई किसी के प्रति धारणा बनाता है तो राग और द्वेष जन्म लेते हैं। वो इनसे बचते हैं। बड़े सरल स्वभाव से हर एक को क्षमा करते हुए चल रहे हैं। किसी के प्रति कोई भी नकारात्मकता नहीं केवल सकारात्मकता ही सकारात्मकता । पूरी सोसाइटी को परिवार मानते हैं। हर एक से हृदय से स्नेह रखते हैं। अपने उत्तरदायित्व के प्रति पूर्णतया समर्पित, किसी के प्रति कोई वैर का भाव नहीं, निश्छलता लिये‌ चले जा रहे हैं।‌ मेरे पास अभी तक रवि सर का यह परिचय अधूरा है। न जाने कितने सद्गुण छुपाए चल रहे हैं। जब से मै रवि सर जैसे नेक दिल, सकारात्मक सोच,परोपकारी, विवेकशील और आदर्श इंसान के सानिध्य में आया हूँ अपने आपको ख़ुशनसीब मानता हूँ, मैंने देखा है कॉलोनी में सब बहुत ही सम्पन्न, विद्वान एवं सहयोगी जनों का निवास है । वहीं रवि सर सबके प्रति सद्भाव, सम्मान, बेटा, बेटियों सा पवित्र रिश्तों को निभाते हुए अपने ह्रदय मैं सबको बसाए हुए चले जा रहे हैं। वे हम सबके वटवृक्ष सी शीतल छाया है । आज सर का जन्मदिवस है 74 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे है उनके अनमोल जीवन, स्वस्थ जीवन, परोपकारी जीवन के लिए ह्रदय तल की गहराइयों से मङ्गल कामनाएँ करता हूं कि सर का अनमोल आशीर्वाद सदा हम सब पर बरसता रहे । रवि सर किसी के दुःख सुख में सामाजिक, धार्मिक, आयोजनों में एक परिवार के प्रमुख की भूमिका निभाते हुए चल रहे हैं । सबको एक सूत्र में जोड़ कर रखने की अदम्य शक्ति लिये, यथार्थ में भक्ति के उपासक हैं। वही दूसरी ओर अपने मोबाईल के कैमरे में भी सभी की तस्वीरों को कैद कर अपनेपन का हमेशा एहसास कराते है। चाहे जन्मदिन, प्रणय बंधन वर्षगाँठ, बच्चों की सफलता, क्रियाशीलता लोगों के व्यक्तित्व पर लेख और भी अन्य गतिविधियों को, गीत के शब्द सुमनों में पिरोकर मनभावन सृजन कर देते है यह प्रतिभा मक्कड़ सर की अपनेपन की निशानी है । उनकी लेखन शैली के सभी कायल है ।धन्य है रवि सर आपकी शालीनता, धैर्यता, विराट व्यक्तित्व के रूप में समाज को अनमोल खज़ाना दिया वो बेमिसाल है, आपके आदर्शों को कभी भूल से भी भूल नही पायेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page