साहित्य दर्पण

कविताः आओ जगवाले को समझायें

आओ जगवाले तुम्हें समझायें
रंग विरंगे गुलशन को लगायें
प्रेम मोहब्बत के फूल लगायें
खुशबू से इस जग को महकायें

गुलशन में होगा रंग विरंगा फूल
विपरीत मत की मिटेगा उसूल
पुरानी बातें तब हो जायेगा गुल
दुश्मनी तब सब जायेगें भूल

आओ चमन में नई महक बनायें
भाईचारा की गुलाब लगायें
सच्चाई की मार्ग अब अपनायें
बेईमानी को सबक सिखलायें

नहीं चाहिये हमें कागज के फूल
महक ना पाये नफरत के धूल
पनप ना पाये दुश्मन की तूल
प्रायश्चित करना है अपनी भूल

जग में मानवता की दीप जलाये
इन्सानियत से जग को चमकायें
प्रेम प्यार की पाठ सिखलायें
कायनात को फिर से सजायें

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