गेहूं की खरीद अपने अंतिम दौर में लेकिन अनियमितताएं भी कम नहीं

गेहूं की खरीद- भाग एक (दीपक तिवारी) गेहूं की खरीद अपने अंतिम दौर में लेकिन अनियमितताएं भी कम नहीं।
जबलपुर(दीपक तिवारी)। कोरोना वायरस की महामारी के बीच गेहूं की फसल खरीद का काम चल रहा है। कुल पंजीकृत किसानों 33485 में से लगभग सभी कृषकों की उपज की खरीदारी हो चुकी है। जिले के कुल 157 खरीद केंद्रों में अब तक 730 करोड़ रुपए के 382000 मैट्रिक टन गेहूं की खरीद की गई है। कुल 384 करोड के ईपीओ जारी हो चुके हैं।
लेकिन इस तस्वीर के कई दूसरे पहलू भी हैं जिनके स्याह रंग कभी किसानों को तो कभी समिति प्रबंधकों को कभी ऑपरेटरों को और कभी किसी अन्य कर्मचारी को तकलीफों के रंग में रंग देते हैं।
प्रस्तुत है अनियमितताओं पर प्रकाश डालती दीपक तिवारी की यह रिपोर्ट
सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियां कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी ले चलते जिला प्रशासन ने सभी गेहूं खरीद करने वाली समितियों और केंद्रों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइजेशन को लेकर अलग से गाइडलाइन जारी की थी। इस वर्ष प्रशासन ने सभी खरीद केंद्रों में किसानों की भीड़ ना लगने देने का निश्चय किया था। जिन किसानों को एसएमएस के द्वारा मैसेज भेजा जा रहा था केवल वही किसान अपनी उपज लेकर खरीद केंद्रों में आ रहे थे। उसके साथ ही खरीद केंद्रों में मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखने की सख्त हिदायत दी गई थी। इसके बावजूद निर्देशों का उल्लंघन कई जगहों पर स्पष्ट रूप से नजर आया। हम बात कर रहे हैं नुनसर स्थित खरीद केंद्र की जहां शाम के वक्त खरीद केंद्र में काम करने वाले मजदूर एक साथ अपने हाथ पांव धोते हुए नजर आए। एक साथ भीड़ में इकट्ठे होकर अपनी पेमेंट भी लेते हैं।ऐसी स्थिति में सोशल डिस्टेंसिंग की तो धज्जियां उड़ती ही हैं साथ ही कोरोनावायरस से लड़ने के प्रशासन के मंसूबे भी फेल होते हैं।
नुनसर केंद्र प्रभारी गंधर्व सिंह ठाकुर ने बताया कि उनके यहां निर्धारित लक्ष्य के तहत खरीदी कर ली गई है और लेबर पेमेंट का पैसा उनकी समिति में नहीं पहुंचा है।
किसी बोरी में तीन सौ ग्राम कम तो किसी बोरी में तीन सौ ग्राम अधिक गेंहू
केंद्र क्रमांक 4 उड़ना केंद्र में पल्लेदार जब गेहूं की बोरियों को तौल रहे थे। तभी यह बात सामने आई कि तौली गई गेहूं की बोरियों में से किसी बोरी में 49 किलो 700 ग्राम गेहूं मिला। तो किसी में 50 किलो 300 ग्राम से अधिक गेहूं पाया गया। इसे लेकर जब वहां के कर्मचारियों से बात की तो उनका कहना था कि लंबे समय तक गेहूं की बोरियां धूप में रखी रहती हैं। जिससे गेहूं की नमी उड़ जाती है इसके चलते गेहूं के वजन में कमी आती है। यही वजह है कि वह 50 किलो से तीन सौ ग्राम से ज्यादा की तौल करते हैं। सवाल यह उठता है कि यदि आप पहले से ही 300 ग्राम से अधिक गेहूं ज्यादा तौल रहे हो तो जिन बोरियों में 300 ग्राम कम गेहूं निकला है उनमें कितने वजन लेकर की नमी उड़ी होगी?
केंद्र के कंप्यूटर ऑपरेटर राहुल तिवारी ने बताया कि बोरियों की तौल में वजन की कमी आ रही है वह गेहूं से नमी उड़ने के कारण है। यदि बोरियां ज्यादा समय तक धूप में रखी रहती है तो बोरियां सड़ भी जाती हैं।
समय पर भुगतान ना होने से किसानों में है आक्रोश
केंद्र क्रमांक चार उड़ना के द्वारा डीजीएमओ ऑफिस पर लगाए जा रहे हैं गेहूं खरीद का भुगतान लेट लतीफ करने के आरोप
केंद्र क्रमांक 4 उडना की बात करें तो प्राप्त जानकारी के अनुसार वहां पर विगत 30 तारीख के बाद से अब तक किसानों का पेमेंट अटका हुआ है और इसकी वजह बताई जा रही है डीजीएमओ ऑफिस को। वहां की लेटलतीफी की वजह से किसानों को भुगतान नहीं हो पा रहा है और किसानों में जबरदस्त रोष व्याप्त है। यहां तक कि वहां वाद विवाद की स्थिति निर्मित हो रही है। इस प्रश्न के जवाब को जानने के लिए जब हमने डीजीएमओ विवेक त्रिपाठी से संपर्क करना चाहा तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
लेबर पेमेंट का भुगतान सरकारी कार्यालय से अब तक नहीं किया गया।
समिति के प्रबंधक को अपने घर के जेवर गिरवी रखकर करना पड़ा लेबर पेमेंट
विगत 2 वर्षों से निरंदपुर समिति में लेबर पेमेंट का पैसा नहीं पहुंचा है
किसान जब अपना खाद्यान्न केंद्र में लेकर आते हैं। तो सबसे पहले उनके माल को सर्वेयर यानी ग्रेडर के द्वारा चेक किया जाता है। ग्रेडर की नियुक्ति विपणन संघ कार्यालय यानी डीजीएमओ ऑफिस से होती है। ग्रेडर के द्वारा माल पास होने के बाद ही किसान का माल क्रय करने की अनुमति समिति को मिलती है। जब किसान का माल तुलाई के लिए आता है तब कांटे पर
माल को बोरियों में भरने के लिए, माल को तौलने के लिए, बोरियों की सिलाई करने के लिए और उसके बाद उसकी गाड़ियों में भरने के लिए जो लेबर काम करती है। उसे सरकारी विभाग के द्वारा पेमेंट दी जाती है। सरकार द्वारा प्रति क्विंटल ₹16 मात्र लेबर पेमेंट के नाम पर जारी किए जाते हैं। किंतु यह पैसा भी समय पर नहीं पहुंच पाता। पूरी खरीद का सीजन खत्म हो चुका है और गेहूं की खरीद की जा चुकी है लेकिन सरकारी विभागों द्वारा किया जाने वाला लेबर पेमेंट का पैसा अब तक समितियों तक नहीं पहुंचा है। इस विषय में जिला खाद्य अधिकारी अधिकारी द्वारा बताया गया। कि कुछ जगहों पर मजदूरों की मजदूरी पहुंचाई गई है और कुछ जगहों पर नहीं पहुंच पाई है। तब बड़ा सवाल ये उठता है कि जिन जगहों पर मजदूरी का पैसा नहीं पहुंचा वहां किस प्रकार लेबर पेमेंट की गई। की भी गई या नहीं। खाद्य अधिकारी को इस बात की कोई जानकारी नहीं है उन्होंने अपना अनुमान लगाते हुए यह बात कही कि लेबर पेमेंट नहीं हुई होगी। समिति प्रबंधकों का कहना है कि उन्होंने अपनी जेब से पैसे खर्च करके लेबर की पेमेंट की है। सेवा सहकारी समिति निरंदपुर के प्रबंधक राजेश पटेल के प्रबंधन में 5 गेहूं खरीद केंद्र आते हैं। उनके सभी केंद्रों में अब तक 1,25,000 क्विंटल गेहूं की खरीद की जा चुकी है। उनका कहना है पूरा का पूरा लेबर पेमेंट उनके द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया है। उन्होंने अपने घर के जेवर गिरवी रखकर लेबर पेमेंट किया गया है। उनकी समिति को विगत 2 वर्षों से लेबर पेमेंट का पैसा नहीं दिया गया है। यह उनकी सबसे बड़ी व्यथा है।अब सवाल यह उठता है कि जहां लाखों मीट्रिक टन अनाज की खरीद होती है वहां पर लेबर पेमेंट भी लाखों- करोड़ों में होता है। यह समिति के प्रबंधक क्या लाखों करोड़ों का पेमेंट अपनी जेब से कर पाते हैं? सरकार द्वारा मजदूरों के पेमेंट में की जा रही इस लापरवाही की क्या वजह है?
व्यवस्था में भ्रष्टाचार केवल इसलिए नहीं होता कि लोग भ्रष्ट हैं बल्कि इसलिए भी होता है कि वहां भ्रष्टाचार की गुंजाइश होती है। इस तरह की लापरवाही निश्चित ही एक भ्रष्टाचार को जन्म देती है जो लोगों के शोषण का कारक बनता है। क्या करोना काल किस वैश्विक महामारी के दौर में जहां दिल खोलकर जरूरतमंदों को केंद्र सरकार और राज्य सरकारें पैसा बांट रही है। सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाएं लोगों में अनाज बांट रही हैं। वहीं इन मजदूरों को पेमेंट समय पर सरकार द्वारा नहीं दिया जा सकता था। यह पेमेंट उनकी मजदूरी के बदले यानी काम के बदले देना था। हमारी पड़ताल का अभी यह पहला भाग है अगला भाग जल्दी अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे।



