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क्या कभी कोई समझेगा संविदा कर्मियों का दर्द?

गर्भकाल के दौरान ही दीपिका साहू काम से निकाल दिया गया।

जबलपुर – संविदा कर्मी, यानी अस्थाई कर्मचारी, जिसकी की पहली लाइन आपके दिमाग में बिठा दी जाती है। कि आपको कभी भी बिना बताए निकाला जा सकता है। बिना इस बात का ख्याल किए हुए कि आपकी आर्थिक परिस्थितियां कैसी हैं? और निकाले जाने के बाद आपका घर कैसे चलेगा? इस बात की चिंता ना नियोक्ता को होती है और ना ही व्यवस्था के जिम्मेदारों को। उन्हें तो केवल अपना काम निकालने से मतलब होता है। यदि आवश्यकता हुई तो हमने संविदा कर्मी को रख लिया जब आवश्यकता नहीं हुई तो हमने निकाल बाहर किया। मामला है पनागर जनपद पंचायत में विगत 6 वर्षों से कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर अस्थाई रूप से कार्यरत श्रीमती दीपिका साहू का। जिन्हें उनके अच्छे कार्य के और अच्छे व्यवहार के बावजूद यह कहकर बाहर निकाल दिया कि अब हमें आपकी सेवाओं की कोई आवश्यकता नहीं है। श्रीमती दीपिका साहू की माने तो वे इस वक्त गर्भकाल में है उन्हें और उनके परिवार को आय के साधन की सख्त आवश्यकता है। भले ही दीपिका साहू की सेवाओं की आवश्यकता सरकार को ना हो परंतु उस कार्य के बदले होने वाली आय की आवश्यकता उनको जरूर है। दीपिका साहू के अच्छे कार्य को देखते हुए पनागर जनपद पंचायत में उनके नियमितीकरण का एक प्रस्ताव फरवरी माह में इस शर्त के साथ भी पारित हो चुका है कि कार्यालय में पद रिक्त होने पर दीपिका साहू को स्थाई रूप से रखा जाएगा। वह प्रस्ताव अभी तक लंबित है।
क्या मिलाकर संविदा कर्मियों के अपने कोई अधिकार नहीं होते? सारी व्यवस्था अस्थाई रूप से कार्य करने वाले इन संविदा कर्मियों की जरूरतों के प्रति उदासीन क्यों बनी हुई है? वे शोषित होने पर मजबूर होते हैं। वह उफ नहीं कर सकते क्योंकि वे संविदा कर्मी है। यदि उनका नियोक्ता नाराज हो गया तो काम से निकाल देगा। कहां है मानवतावादी संगठन और मानव अधिकारों के रक्षक। क्या अचानक किसी को विषम आर्थिक परिस्थितियों में झोंक देना अनुचित नहीं?यह चंद ऐसे सवाल हैं जो भले ही आज बौने दिख रहे हो। परंतु आने वाले समय में यह सवाल जब व्यवस्था के ऊपर लगातार तमाचा मारना शुरू करेंगे तब नीति निर्धारक कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। आज भले ही श्रम मंत्रालय इन संविदा कर्मियों की तकलीफों से मुंह फेर कर बैठा हो उदासीन बैठा हो। परंतु आने वाला समय जब इन जिम्मेदारों से सवाल पूछेगा कि क्या कमी थी इनमें जो अस्थाई कर्मचारी हैं और उनकी योग्यता में जिन्हें तुमने स्थाई रूप से रखा हुआ है उनमें। आखिर जिन पदों पर आपको स्थाई कर्मचारियों की आवश्यकता है वहां अस्थाई कर्मचारी क्यों रखे जाते हैं? इन संविदा कर्मियों के वर्तमान में इतनी अनिश्चितता क्यों है कि कभी भी उसे भविष्य के अंधकार में फेंक दिया जाए। देश आजादी का जश्न तो बड़ी धूमधाम से मनाता है। हर सरकारी दफ्तर पर तिरंगा लहराता है। पर क्या यह बंधुआ मजदूरी का नया चलन नहीं है? क्या यह उसी सामंतवादी व्यवस्था का दूसरा स्वरूप नहीं है? जहां एक व्यक्ति को भले ही शारीरिक बल की बदौलत बांधकर मजदूरी ना करवाई जाती हो। लेकिन उसकी आर्थिक मजबूरियों और कमजोरियों के चलते उससे तब तक काम कराया जाता है जब तक मतलब निकले और काम निकल जाने पर हम उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल सब बाहर फेंकते हैं।
कार्यालय में आवश्यकता अनुसार दीपिका साहू को रखा गया था और आवश्यकता समाप्त होने पर उन्हें निकाल दिया गया मेरा स्थानांतरण अभी-अभी यहां हुआ है अतः मुझे यह जानकारी नहीं है कि वह कितने समय से कार्यरत थीं? इस बात की भी कोई जानकारी नहीं है कि उनके नियमितीकरण का कोई प्रस्ताव जनपद पंचायत में पास हो कर लंबित है।
उदय राज सिंह
सीईओ जनपद पंचायत पनागर

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