बाघ कारीडोर का दिखाया सपना उजाड़ रहे हैं जंगल

बेलगाम वन विभाग का खेल शासन प्रशासन भी शामिल
सतना। विंध्य प्रदेश के सतना जिले में धारकुंडी और चित्रकूट के मध्य सरभंगा आश्रम का इलाका है।घने जंगल वाले सरभंगा आश्रम में बाघों के लिए अनुकूल मौसम रहने की वजह से केंद्र सरकार ने सरभंगा आश्रम के जंगल में बाघों की सुरक्षा के लिए बाघ कारिडोर का निर्माण कराने की घोषणा की थी।ऐलान करने के बाद 200 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए लेकिन उसके बाद से सरकार ने अति महत्वपूर्ण बाघ कारिडोर जैसे अति महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
इधर मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के इशारे पर खनन माफियाओं ने सरभंगा आश्रम वाले पहाड़ पर ढाई हेक्टेयर जमीन पर लीज स्वीकृत करवा ली है।सरभंगा आश्रम के आसपास की जमीन वन विभाग की संपत्ति है। यह वही वन विभाग है जिस पर बाघ को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी रहती है। फारेस्ट विभाग के जिला और संभाग में बैठने वाले अधिकारी मूकदर्शक बने रहे और शासन स्तर डायरेक्टर लीज स्वीकृत कर दी गई।सरभंगा आश्रम का जंगल घना जरुर है पर जिस तरह से रात दिन पोकलेन मशीनों के साथ उत्खनन कराया जाता है उससे बाघ सहित वन्य प्राणियों की जिंदगी खतरे में रहती है। सरभंगा आश्रम का जंगल बाघ का रहवास कहा जाता है। इसके बाद भी शासन स्तर पर बैठे वन विभाग के आला अधिकारी राजनैतिक पावर के सामने सरेंडर हो गये और सरभंगा आश्रम से लगे पहाड़ी हिस्से पर पांच हेक्टेयर जमीन की लीज स्वीकृत की गई है।
अनुमति देते हुए कहा गया था कि लीज धारक को ढाई हेक्टेयर जमीन पर खनन करना था । लेकिन यहां पर पूरे पहाड़ को तहस-नहस कर दिया गया है।
मुरारी लाल बंसल के नाम पर वन विभाग के शासन स्तर पर बैठने वाले आला अफसरों ने सरकार के इशारे पर खदान की स्वीकृति प्रदान की गई। खनन माफिया ने भाजपा सरकार का संरक्षण होने के कारण पूरी व्यवस्था को अपने हाथों में लेकर पहाड़ी हिस्से पर अंधाधुंध उत्खनन का सिलसिला चल रहा है।
रात दिन पोकलेन मशीनों का शोर,
वन्य प्राणी विचलित
हमारे सतना सहित विंध्य प्रदेश में वैसे भी जंगलों को समाप्त करने का कुचक्र रच डाला है। सरभंगा आश्रम को राजनैतिक संरक्षण में मिटाने का संकल्प लिया गया है।
खनन माफियाओं का नेटवर्क सतना में बहुत मजबूत है। सरभंगा आश्रम से लगे पहाड़ पर बॉक्साइट और लेटराइट निकालने के लिए शासन स्तर से भारी दबाव में खदान की स्वीकृति वन विभाग ने चुटकी बजाते दे दी। यहां पर चौबीस घंटे रात दिन दर्जन भर से अधिक पोकलेन मशीनों से दनादन खनिज संपदा को माफिया निपटा रहा है। रात के समय लोगों की चहलकदमी बंद हो जाने के कारण पूरे जंगल में उत्खनन की आवाज फैल जाती है। पोकलेन मशीनों से निरंतर सरभंगा आश्रम के ऊपर होने वाले उत्खनन और तेज आवाज के कारण बाघ सहित अन्य वन्य प्राणी विचलित होकर इधर-उधर भागने लगते हैं। इस भागमभाग के बीच जब एक बाघ दूसरे बाघ के हिस्से में पहुंच जाता है तो दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई होने लगती है। जिसमें एक बाघ की असमय मौत हो जाती है। दूसरे वन्य प्राणियों को भी असमय काल के गाल में समा जाना पड़ता है।
डेढ़ साल में तीन बाघ की मौत,
फारेस्ट बन गया दुश्मन
जिला प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार वन विभाग पर भाजपा सरकार का भारी दबाव होने के कारण बाघ कारिडोर वाले सरभंगा जंगल में रहने वाले तीन बाघो की मौत डेढ़ साल में हो चुकी है। इसके बाद भी बेलगाम वन विभाग की आंखें नहीं खुली और सरकार के दबाव में पांच हेक्टेयर खदान के लिए स्वीकृत डायरेक्टर भोपाल से मिल गई है। अपना व्यक्तिगत फायदा लेकर वन विभाग भाजपा सरकार के दबाव में आया और बाघ कारिडोर वाले जंगल में खदान स्वीकृत कर दी। क्या फारेस्ट विभाग को बाघ सहित अन्य वन्य प्राणियों की जिंदगी से खिलवाड़ करने का विशेषाधिकार क्या सरकार ने दिया है?यदि नहीं तो फिर बाघों के अनुकूल वातावरण वाले सरभंगा जंगल को तबाह क्यों किया जा रहा है।
वन्य प्राणियों की तस्करी का अंदेशा,
कैसे बचेंगे जंगल?
सरभंगा आश्रम से लगे घने जंगल को तबाह करने की साजिश भाजपा सरकार के इशारे पर रची गई है। भाजपा सरकार में सुपर पावर रहे विंध्य क्षेत्र के पूर्व मंत्री ने सरभंगा जंगल में वन विभाग की अनुमति दिलवाकर खदान चालू कराने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वन विभाग की सुनियोजित लापरवाही के कारण सरभंगा जंगल के वजूद पर संकट उमड़ आया है। सरभंगा आश्रम से लगे पहाड़ पर खदान की लीज मुरारीलाल बंसल को मिली है जो 8-9 नवंबर 2020 को समाप्त हो जाएगी। भारी विरोध के कारण दो बार खदान को बंद करवाया जा चुका है। सरकार के इशारे पर वन विभाग के आला अधिकारियों ने पहाड़ को तबाह करने का लाइसेंस दे दिया।सूत्रों की मानें तो जिस तरह रात दिन उत्खनन के लिए हैवी मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, इस उत्खनन के बीच घने जंगल में रहने वाले वन्य प्राणियों की तस्करी को अंजाम दिया जाता है। इस मामले में कभी वन विभाग ने जांच तक करना जरूरी नहीं समझा। पन्ना टाइगर रिजर्व से एक बाघिन P20 को सरभंगा जंगल में लाया गया था। जिसने समय समय पर शावकों को जन्म दिया लेकिन वे सभी कहां गायब हो गये यह कोई नहीं जानता। वन विभाग ने सरभंगा जंगल में रहने वाले बाघों की चिंता वन विभाग को कभी नहीं रही, यही वजह है कि बाघों को सुरक्षित रखने की दिशा में कोई योजना नहीं बनाई गई है।सूत्रों ने बताया कि ऐतिहासिक सरभंगा आश्रम से लगे घने जंगल में आज भी करीब दो दर्जन बाघ सक्रिय हैं। वन विभाग में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की बहुलता होने का दंशा जंगल और वन्य प्राणियों को झेलना पड़ रहा है।इस मामले में कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण अधिकारी को भी पैतरेबाजी में माहिर वन विभाग गुमराह करता है।



