औद्योगिक इकाइयों का रहनुमा बन गया प्रदूषण विभाग


वातावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा कागजी खानापूर्ति
रवि शंकर पाठक सतना। औद्योगिक विकास की चकाचौंध के बीच हमारे चारों तरफ बने रहने वाले वातावरण को जहरीला बनाने का काम सरकारी मशीनरी के साथ मिलकर निरंतर किया जा रहा है।
केंद्र और राज्य सरकार ने जिस पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना की है,
वही औद्योगिक घरानों के साथ मिलकर पर्यावरण को क्षति पहुंचाने का काम निरंतर ईमानदारी से कर रहा है। कागजी खानापूर्ति वातावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है।
विंध्य प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना होने के उपरांत पर्यावरण को चौपट करने का महाभियान शुरू कर दिया गया। वातावरण में प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों, विभिन्न खदानों और स्टोन क्रेशरो का सबसे बड़ा रहनुमा पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बन गया है।
इस सरकारी विभाग में तैनात कर्मचारियों से लेकर डायरेक्टर तक प्रदूषण को वास्तविक रूप से नजर अंदाज करने के एवज में लाखों रुपए की कमाई प्रतिमाह करते हैं।
विंध्य प्रदेश के रीवा और सतना जिले की स्थिति लगभग एक समान है।
दोनों जिलों में औपचारिकता निभाने के लिए पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कार्यालय संचालित किया जाता है।
ऐसी कोई सीमेंट फैक्ट्री विंध्य प्रदेश में नहीं है जो शासन के तमाम मापदंडों को शत प्रतिशत पूरा करती है। यही हालत खदानों और स्टोन क्रेशरो के आसपास बनी रहती है। जानलेवा डस्ट का गुबार पर्यावरण को जहरीला बना रहा है। किसी भी सीमेंट फैक्ट्री, खदान और स्टोन क्रेशर पर पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कोई कंट्रोल नहीं होता है।
गुमराह करने वाले दस्तावेजों के सहारे एनओसी
औद्योगिक इकाइयों के इशारे पर पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ठूमका लगाने का आदी हो गया है। लेटेराइट, बालू, पत्थर और पटिया की खदानों के मामले में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध रहती है।
गुमराह करने वाले फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लोग ही राजधानी भोपाल से एन ओसी दिलवाने का काम करते हैं।
इस तरह की एन ओसी दिलवाने के नाम पर पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसर पांच से दस लाख रुपए की कमाई कर लेते हैं। सूत्रों ने बताया कि गुमराह करने वाले दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षर कर एन ओसी हासिल कर ली जाती है।
पूरा सिस्टम करप्ट, केवल दिखावे की कार्यवाही
औद्योगिक इकाइयों, खदानों और स्टोन क्रेशर संचालन के मामले में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका केवल दिखावे तक सीमित रह गई है। वातावरण को जहरीला बनाने वाले संस्थानों पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं की जाती है। सतना, रीवा से लेकर भोपाल तक में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका केवल पैसों की वसूली तक सीमित रहती है।
सीमेंट फैक्ट्री, खदान और स्टोन क्रेशर से निकलने वाले डस्ट के गुबार को कभी संजीदगी के साथ नहीं लिया जाता है।
हर महीने औद्योगिक इकाइयों, खदानों और स्टोन क्रेशर संचालकों से मोटी रकम वसूल करने वाले पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड विभाग की वजह से ही वातावरण की हालत लगातार खराब होती जा रही है।
अकेले औद्योगिक इकाइयों से 50 लाख महिना कमाई
सीमेंट फैक्ट्री, खदानों और स्टोन क्रेशर के संचालकों से हर महीने पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जिम्मेदार मोटी रकम वसूल करते हैं। रीवा और सतना जिले में संचालित औद्योगिक इकाइयों जैसे जेपी सीमेंट प्लांट, अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड बेला, बिरला सीमेंट फैक्ट्री, मैहर रिलायंस, केजेएस मैहर, मैहर सीमेंट प्लांट बघवार सहित अन्य छोटी बड़ी औद्योगिक इकाइयों से अकेले हर महीने पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जिम्मेदार लगभग पचास लाख रुपए की ऊपरी कमाई करते हैं।
इसी तरह से खदानों और स्टोन क्रेशर संचालकों से अतिरिक्त कमाई को अंजाम दिया जाता है।



