साहित्य दर्पण
ज़िंदगी रास ना आई…

ना ही वफ़ा रास आई
ना ही ज़िंदगी रास आई
दिन भर बुरे ख़्वाब आते
रहे रातों को नींद ना आई
दर्पण के सामने हमारी
सूरत नज़र ना आई
धूप में लौट कर वापिस
हमारी परछाई ना आई
ये बेरुखी, तनहाई हमें
किस मोड़ पर ले आई
उदासी ने ऐसा घेरा था की
चेहरे पे फिर हँसी ना आई
चंद साँसे बची थी उतने
में मौत की खबर आई



