डिंडोरी दर्पणमध्य प्रदेश

जब..सरकारें कर रही रोजगार देने का दावा, तो महानगरों में पलायन क्यों..?

नंदकिशोर ठाकुर,डिंडोरी ब्यूरो। एक तरफ सरकारें लगातार रोजगार देने का दावा कर रही है, स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लिए भी सतत प्रयासरत है। वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में आज भी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों से लोग पलायन करके महानगरों की जातें हैं, कारण कि जिले व आसपास के क्षेत्रों में रोजगार के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं है। गौरतलब है कि बड़ी संख्या में लोग रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों में जाकर रोजगार की जुगत कर रहे हैं, जहां सरकारों के दावे धरे के धरे रह जा रहे हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब पर्याप्त मात्रा में सरकार जब स्थानीय स्तर पर रोजगार देने का दावा कर रही है, तो महानगरों की और बड़ी संख्या मैं लोग पलायन आखिर क्यों कर रहे हैं। गौरतलब है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार की पर्याप्त उपलब्धता करवाने ना तो स्थानीय जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे हैं और ना ही क्षेत्रीय नेता रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित करवाने की कोई ठोस पहल कर रहे। जिससे आदीवासी बाहुल्य क्षेत्रों में बेरोजगारी दिनों दिन बढ़ती जा रही है, क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए संसाधन उपलब्ध नहीं हो रहे।

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में नहीं है, रोजगार के पर्याप्त संसाधन :-  मध्य प्रदेश के अधिकांश जिलों में आदिवासी लोग ही निवासरत हैं। जानकारी अनुसार डिंडोरी व मंडला जिले में रोजगार के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं है, जहां से हर साल सैकड़ों की संख्या में लोग पलायन करके महानगरों की ओर जाते हैं। बताया गया कि जिले में रोजगार के पर्याप्त संभावनाएं भी है, प्राकृतिक संपदाएं व ऐतिहासिक मंदिर सहित जिले में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। ठोस पहल होने के बाद ज़हां बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलेगा तो वही पर्यटक सहित सैलानियों का पहुंचना भी शुरू हो जाएगी। जिससे रोजगार के नए-नए संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे, लोगों को पलायन नहीं करना पड़ेगा। बताया गया कि रेल लाइन ना होने से क्षेत्रों के विकास नहीं हो रहे, जबकि जनप्रतिनिधि लंबे समय से रेल लाइन के वादे करते आ रहे हैं। ऐसा ही एक वाक्य पिछले दिनों जनपद पंचायत समनापुर के चांदरानी मड़ई के दौरान देखने को मिला, जहां लगभग आधा दर्जन लोग रोजगार की तलाश में यहां वहां डेरा जमाकर पेट पाल रहे हैं। रोजगार की तलाश में कड़ी मेहनत करके रोजी-रोटी कर जीवन का गुजर बसर करने को मजबूर देखे गए।

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