शिक्षा मानव को मानव बनाती हैःडॉ डी पी शुक्ला

महाराजा काॅलेज के स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ द्वारा महात्मा गांधी विषय पर बेविनार का हुआ आयोजन
जन्मदिवस पर बापू और शास्त्रजी का किया स्मरण
छतरपुर। स्थानीय शासकीय महाराजा महाविद्यालय छतरपुर के स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ द्वारा गाँधी जयंती एवम विश्व अहिंसा दिवस पर “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा और महात्मा गाँधी”विषय पर बेबीनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराजा महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ डी पी शुक्ला ने की।मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर एन के जैन ने गरिमा प्रदान की।विषय विशेषज्ञ का दायित्व प्रोफेसर जे पी शाक्य ने निभाया।कार्यक्रम का संयोजन प्रोफेसर एस के छारी ने किया।
स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ के प्रभारी प्रोफेसर जे पी शाक्य ने बताया कि कार्यक्रम के प्रारंभ में प्राचार्य डॉ डी पी शुक्ला एवम अतिथियों ने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर फूलमालाएं अर्पित कर बापू और शास्त्रजी जी को याद किया।डॉ शुक्ला ने बेबीनार में उपस्थित सभी प्रतिभागियों, आयोजकों एवम तकनीकी टीम का हार्दिक स्वागत किया। बेबीनार का प्रारंभ करते हुए डॉ शुक्ला ने कहा कि महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे।उन्होंने तत्कालीन शिक्षा पद्धति को अप्रासंगिक माना और मातृभाषा हिंदी के सम्मान का पुरजोर समर्थन किया।वे चाहते थे कि सम्पूर्ण शिक्षा मातृभाषा में दी जाय।गाँधी जी के अनुसार सच्ची शिक्षा वही है जो मानव को मानव बनाये,उसके समग्र विकास में योगदान दे,उसे कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करे। उन्होंने गांधीजी के साथ श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का भी पुण्य स्मरण किया। मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रोफेसर एन के जैन ने कहा कि महात्मा गांधी एक नैतिक पुरुष थे इसलिए वे शिक्षा के द्वारा मानव जीवन में मूल्यों व आदर्शों की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए।नैतिकता विहीन शिक्षा अनुपयोगी है।भारतीय शिक्षा जीवन मूल्यों पर केंद्रित है।प्रोफेसर जे पी शाक्य ने कहा कि महात्मा गांधी विचारों के महासागर हैं।जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं है जिस पर गांधीजी ने अपने विचार न व्यक्त किये हो। गांधीजी शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजों की राजनैतिक गुलामी के साथ साथ मानसिक गुलामी से भी मुक्ति दिलाना चाहते थे।वे कहते थे कि जिस विद्या को ग्रहण करने से हमारी स्वतंत्रता दूर हो जाती दिखाई दे, उस विद्या का त्याग कर देना चाहिए।विद्या वही है जो हमें मुक्ति प्रदान करें।कार्यक्रम के अंत में प्रोफेसर एस के छारी ने महात्मा गांधी को महामानव मानते हुए कहा कि सदियों में कोई एक ऐसा महामानव धरती पर अवतरित होता है।उनकी शिक्षा की अवधारणा जीवन की अनुभूतिओं पर आधारित है। प्रोफेसर छारी ने कार्यक्रम के अंत में सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।



