भारतीय संविधान के निहितार्थों का दुरुपयोग
विजय तिवारी ‘किसलय’
देशभक्तों और आजादी हेतु प्राणोत्सर्ग करने वाले रणबांकुरों के स्वतंत्रता आंदोलन के परिणाम स्वरूप भारतीय संविधान को भारतीयों द्वारा ही बनाए जाने की मांग अंतत: अंग्रेजों को मानना ही पड़ी थी। राष्ट्र समर्पितों के राष्ट्रप्रेम, देश के सर्वांगीण विकास की भावना एवं राष्ट्रीय एकता का प्रतिमान रूपी हमारा संविधान हम सबके सामने है। यह हमारी सोच, संस्कृति एवं हमारे गणतंत्र राष्ट्र की ढाल है, जिसके मजबूत सहारे से आज हम 21 वीं सदी की शिखरीय यात्रा पर अग्रसर हैं। आधे करोड़ से भी अधिक रुपयों के खर्च पर हमारे संविधान का निर्माण 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में हुआ । 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियों वाले इस संविधान को पूर्ण रूपेण 26 जनवरी सन 1950 को लागू किया गया। विश्व के वृहद्तम संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत इसमें संशोधनों की भी व्यवस्था की गई है, जो कि हमारे संविधान के लचीलेपन का द्योतक है । सन 1950 से हम प्रतिवर्ष संविधान स्थापना स्मृति को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हुए 72 वर्ष का सफर तय कर चुके हैं परंतु क्या आज भी हम, अपने संविधान में निहित भावनाओं को समझ सके हैं? क्या हमारा संविधान जन-जन तक पहुँच सका है? आज भी हमारे देश में अधिकांश ऐसे लोग हैं जिन्होंने संविधान की प्रति भी नहीं देखी। आज उच्च पदों पर स्वार्थ, ईर्ष्या, दुर्भाव एवं व्यक्तिवाद की छाप स्पष्ट नजर आती है। संविधान की सीमाएँ अब उच्च पदस्थ हस्तियों के इशारों पर बदल जाती हैं। संविधान एवं न्याय ज्ञाता स्वार्थों के अनुरूप उनके मायने ही बदलने की कोशिशों में लगे रहते हैं। कुछेक तथाकथित कानूनविदों ने इसी संविधान का माखौल उड़ाते हुए इसकी जनसेवी भावना को हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया है। क्या आज हम गणतंत्र दिवस इतनी सहजता से मना पाते हैं, जितना एक स्वतंत्र, समृद्ध एवं खुशहाल राष्ट्र के लोगों को मनाना चाहिए । हमारे देश के नेता और नागरिक दोनों ही इस महापर्व को मनाते वक्त आनंदित होने के स्थान पर आशंका-कुशंकाओं से भयभीत नजर आते हैं। देश की सीमा, आंतरिक व्यवस्था अथवा राजनीतिक क्षेत्र कहीं भी अमन-चैन नहीं है। आज भी देश के सुदूर ग्रामीण और वनांचलों में ऊँच-नीच, जाति-पाँति एवं अमीरी-गरीबी की दीवारें विद्यमान हैं। गणतंत्र का दंभ भरने वालों की नजरें इन तक पहुँचने में शायद सदी भी कम पड़े। कागजी योजनाओं एवं स्वार्थपरक नीतियों के क्रियान्वयन में ही इनका कार्यकाल समाप्त हो जाता है। उन्हें अपनी सर आँखों पर बैठाने वाला मतदाता स्वयं मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहता है। मौलिक संविधान की जानकारी के अभाव में आम नागरिक अपनी आवश्यकताओं हेतु आवाज उठाने से डरता है, जिसका लाभ चालाक तंत्र बखूबी उठाता रहता है। तात्पर्य यह है कि परोक्ष रूप से अपने ही देश में अपने ही लोगों द्वारा हमारा शोषण होता रहता है। हम संविधान को पढ़कर संविधान में दिए हकों का उपयोग नहीं कर पाते। बदलते समय और परिवेश में हमारा विशाल संविधान भी अपना बखूबी दायित्व निर्वहन करने में असमर्थ सा प्रतीत होता है। तभी तो आज संविधान की उपादेयता एवं उसमें समयोचित संशोधनों की सुगबुगाहट होने लगी है। आज संविधान की आड़ में अनेक प्रभावी एवं राष्ट्रीय एकता को एक सूत्र में पिरोने वाली नीति लागू नहीं कर सकते। आज उचित एवं अनिवार्य होते हुए भी देश के कर्णधार नीतिगत निर्णय नहीं ले पाते। राजनीतिक विपक्ष नीतिगत निर्णयों की अनदेखी कर “विरोध हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है” का नारा चरितार्थ करने में लगा रहता है। आज हमारे संविधान में ऐसे संशोधनों की महती आवश्यकता है, जिससे सुदूर भारतवासी भी गणतंत्र का शत प्रतिशत लाभ प्राप्त कर सके। वह अपने ही देश में शोषण का शिकार न हो । संविधान में ऐसी व्यवस्था होना चाहिए जिससे हम राष्ट्रीय एकता को और मजबूत बनाते हुए राष्ट्र के विकास को नए आयाम दे सकें। हम उन समस्त देशभक्तों, स्वतंत्रता के पुजारियों एवं ज्ञात-अज्ञात शहीदों की आकांक्षाओं को पूरा कर सकें। हमारे इतिहास पुरुषों ने अपने बुद्धि-विवेक से हमारे लिए ऐसे संविधान का निर्माण किया है जिसकी बरगदी छाँव में हमारा गणतंत्र गुणोत्तर पुष्पित-पल्लवित हो रहा है। हमें गर्व होता है कि हम विश्व के महानतम् एवं विशाल गणतंत्र देश के नागरिक हैं। समय और प्रगति का पहिया निरंतर गतिशील है। हम भारतीयों में वर्तमान ऊँचाई से भी आगे दृष्टि दौड़ाने का हौसला है। हम शिखर पर पहुँचने का जज़्बा रखते हैं परंतु 72 वर्ष पूर्व के संविधान से यह अब संभव नहीं है। हमारी धारणा, बदलते जा रहे परिवेश में संविधान के नीतिगत पहलू के बदलाव से है। प्रत्येक जागरूक भारतवासी अपने संविधान के विशाल वृक्ष में और भी नए एवं मीठे फलों की इच्छा रखता है तथा यह निश्चित ही है कि जब तक हम इन मीठे फलों अर्थात संविधान के अनिवार्य से लगने वाले संशोधनों को मूर्तरूप देने हेतु निजी स्वार्थ एवं पक्ष-विपक्ष की भावना से ऊपर नहीं उठेंगे तब तक हमारा विकास और राष्ट्र की खुशहाली का सपना अधूरा ही रहेगा। आज के गिरते राजनीतिक स्तर को देखकर प्रत्येक भारतीय चिंतित दिखाई देने लगा है। इस चिंता का विषय निश्चित रूप से यही है कि आज की दलगत राजनीति में क्या सकारात्मक परिवर्तन हो पाएगा ? क्या हमारे संविधान में ऐसा परिवर्तन संभव है कि हमारे देश के कर्णधार संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर तथा मिल-जुलकर राष्ट्रीय विकास की धारा में शामिल हो पाएँ। शायद हाँ शायद न। यही प्रश्न हमारे भविष्यपथ का दिशा सूचक है।



